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विश्व-मंदिर वियोगी हरि

परमेश्वर का यह समस्त विश्व ही महामंदिर है। इतना सारा यह पसारा उसी घट घट-व्यापी प्रभु का घर है, उसी लामकाँ का मकान है। पहले उस मनमोहन को अपने अंदर के मंदिर में दिल भर देख लो, फिर दुनिया के एक-एक जर्रे में उस प्यारे को खोजते चलो। सर्वत्र उसी प्रभु का सुंदर मंदिर मिलेगा,

*रूसी क्रांति को कैसे देखें* ✍ कविता कृष्‍णपल्लवी

रविवार के जून अंक में रूसी क्रांति के सौ बरस पूरे होने पर तीन लेख छपे हैं। यह दूसरा है : क्रांति का संक्षिप्त मूल्यांकन आलेख का यूनिकोड टेक्‍सट उपलब्‍ध करवाने के लिए सम्‍पादक राजकिशोर जी का धन्‍यवाद ____________________ रूस की अक्टूबर क्रान्ति की शतवार्षिकी (नये कैलेण्‍डर के हिसाब से यह 7 नवम्बर, 1917 को

ईश्वर का प्रश्न‍ लीलाधर जगूड़ी

ईश्‍वर तुम शब्‍द हो कि वाक्‍य हो? अर्द्धविराम हो या पूर्णविराम? संबोधन हो या प्रश्‍नचिह्न? न्‍याय हो या न्‍यायशास्‍त्री? जन्‍म हो कि मृत्‍यु या तुम बीच की उलझन में निरा संभोग हो तुम धर्म हो कि कर्म हो या कि तुम सिर्फ एक कला हो रोग हो ईश्‍वर तुम फूलों जैसे हो या ओस जैसे

गेहूँ बनाम गुलाब रामवृक्ष बेनीपुरी

गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं – पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए?

वो पहली ईद

और आज ईद का मौका था। दिन याद करने का उसको; जिसके लिए कहा गया है “रब्बिल-आलमीन” और छोटा रहीम दौड़कर घर में घुसा तैयार हो रहे अब्बू की टांगो से लिपट कर बोला “अब्बू अजान हो रही है मैं भी चलूंगा”बाप की आंखें छलक आई मस्जिद में आज मेरे बच्चे की पहली नमाज होगी

जीवन संदेश

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना। रूप रस नव गन्ध दे, उपवन सदा सुरभित बनाना॥ (1) तोड़ता है कौन तुझको, गूँथता है कौन तुझको? फेंकता है, कुचता है, यह कभी परवाह मतकर- चाह ले मत झूमना तू, आह सहकर मुस्कराना। नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥ (2) भूलना उसको नहीं, जिसने तुझे ऐसा बनाया। फूलना

सच्चे सौंदर्य की शोध और साक्षात्कार

पाप के स्वरूप में एक भयानक आकर्षण होता है, ऐसा आकर्षण जैसा एक शलभ के लिये दीप शिखा में। शिखा के सम्मोहन में फंसकर पतंगा अपने पंख जलाकर भी उसी की ओर रेंगता रहता है। यहाँ तक कि आखिर जलकर खाक ही हो जाता है।क्या कारण है कि पाप के प्राणहन्ता सौन्दर्य की ओर मनुष्य

उड़नपरी पी. टी. उषा की अनोखी दास्तान

२७ जून १९६४ में केरल के पय्योली गाँव के एक गरीब परिवार में पी टी उषा का जन्म हुआ। पिलावुळ्ळकण्टि तेक्केपरम्पिल् उषा यानि पी. टी. उषा(P T Usha) उनका पूरा नाम था और गरीबी से भरे उनके बचपन को देखकर कोई नहीं कह सकता था की एक दिन ये लड़की एशिया की सर्वश्रेष्ठ महिला एथेलीट

हम दीवानों की क्या हस्ती

भगवती चरण वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में हुआ था। वर्माजी ने इलाहाबाद से बी॰ए॰, एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की और प्रारम्भ में कविता लेखन किया। फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात हुए। १९३३ के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे। १९३६ के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता

मैं नास्तिक क्यों हूँ? भगतसिंह (1931)

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के