वैज्ञानिक मानवतावाद के इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है| अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था – “ईश्वर मनुष्य का सबसे बड़ा अविष्कार है|”  यह बात कितनी सच है यह तो मैं नहीं जानता लेकिन एक बात जानता हूँ कि अगर यह एक अविष्कार है तो इसने लाभ की बजाय मानवता को हानि ही ज़्यादा पहुँचायी है और अगर ये वास्तविकता है तो वो भी उसके नाम पर दुनियाँ भर में मच रहे भेदभाव और मारकाट पर अफ़सोस ज़रूर कर रहा होगा|

दुनियाँ भर के बुद्धिवादी इस सोच में है कि इस धरती पर सिवाय नफरत के और क्या बढ़ रहा है| मज़ा तो ये है की हमारे धार्मिक नेता भी हमें यही समझा रहे है की हिन्दू अच्छा हिन्दू बन जाये, मुसलमान अच्छा मुस्लिम तो भी शांति आ जाएँगी| लेकिन एक अच्छा हिन्दू और एक अच्छा मुस्लिम, एक अच्छा जैन और एक अच्छा बौद्ध , एक यहूदी और एक ईसाई होना ही झगङे के बीज है|

इस ब्लॉग पर हम खुले मन-मस्तिष्क वाले उन युवा-मित्रों का आवाहन कर रहे है जो इन सकीर्ण सीमाओं से मुक्त हो कर अच्छे इंसान बनने की बात को बड़ा मानते है| गर्व से खुद को हिन्दू या मुसलमान मानने की बजाय विनम्रता से खुद को इंसान मानते है|

राष्ट्रों की सीमा से बढ़कर विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को गले लगाना चाहते है| जिनके लिए स्वर्ग और नर्क कही ऊपर नहीं इसी दुनियाँ में है| जो धर्म को चित्त की शुद्धता और समाज के सुख चैन में मानते है| जिन्हे सातवें आसमान पर बैठे उस ईश्वर से उम्मीद नहीं है जो अपनी पूजा करने वाले को स्वर्ग भेजता है और न करने वाले को नर्क|  हम उस ईश्वर में भरोसा करते है जो मज़लूमो और उपेक्षितों के ह्रदय में बैठा समानता, स्वास्थ्य, शिक्षा और आत्मसम्मान के लिए राह ताक रहा है|

विज्ञान जिन्हे धर्म का दुश्मन नहीं सद्धर्म का दीपक प्रतीत होता है|  जो अपने अच्छे या बुरे अतीत का रोना न रोकर भविष्य के उजालों का तेल बनना चाहते है| जो भारत को एक वैज्ञानिक रूप से धार्मिक समाज के रूप में देखना पसंद करते है|

मित्रों अब संगठन की ताकत में भरोसा करते है और जब अतिवादियों और धर्मांधों का संगठन हो सकता है तो उनसे मुक़ाबला करने के लिए हमारा भी साथ होना जरूरी है|

आइये भारत को एक वैज्ञानिक चित्त देने की कोशिश करे, क्यूँकि कचरा चाहे अपने घर का ही क्यों न हो, सुबह झाड़ू लगाकर उसे बाहर फैंकना ही पड़ता है|

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