*रूसी क्रांति को कैसे देखें* ✍ कविता कृष्‍णपल्लवी

रविवार के जून अंक में रूसी क्रांति के सौ बरस पूरे होने पर तीन लेख छपे हैं। यह दूसरा है : क्रांति का संक्षिप्त मूल्यांकन आलेख का यूनिकोड टेक्‍सट उपलब्‍ध करवाने के लिए सम्‍पादक राजकिशोर जी का धन्‍यवाद ____________________ रूस की अक्टूबर क्रान्ति की शतवार्षिकी (नये कैलेण्‍डर के हिसाब से यह 7 नवम्बर, 1917 को हुई थी) के अवसर पर पूरी दुनिया में वे सभी लोग इसे याद कर रहे हैं, जिन्होंने ‘इतिहास के अन्त’, ‘क्रान्तियों के महाख्यानों के विसर्जन’ और उत्तर-मार्क्सवाद से ले कर उत्तर-सत्य के नये युग के आगमन के बौद्धिक शोरगुल के बीच भी मानवता की मुक्ति और एक शोषणमुक्त, समतामूलक समाज के निर्माण की ऐतिहासिक परियोजना में अपना विश्‍वास नहीं खोया है। *बीसवीं सदी के इतिहास को गढ़ने और एक सुनिश्चित शक्ल देने में अक्टूबर क्रान्ति की भूमिका सर्वोपरि थी। 7 नवम्बर, 1917 के बाद दुनिया वैसी ही नहीं रह गयी, जैसी वह पहले थी।* अक्टूबर क्रान्ति के बाद जर्मनी, हंगरी और इटली में सर्वहारा क्रान्ति के प्रयास यदि विफल नहीं हो जाते, तो शायद आज तक का इतिहास कुछ और ही होता। लेकिन इसके बावजूद अक्टूबर क्रान्ति का आमूलगामी प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा। युद्धपोत अव्रोरा के तोपों के धमाकों की गूँज पूरी दुनिया में सुनाई पड़ी। ग्रीस, आयरलैंड और माल्टा से ले कर तुर्की, मिस्र और मेक्सिको तक पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति की लहर आगे बढ़ी, जो अपने अधूरेपन के बावजूद इतिहास को आगे गति दे रही थी। उपनिवेशों, अर्द्धउपनिवेशों और नाम मात्र की राजनीतिक स्वतंत्रता वाले देशों में (जिन्हें बाद में नवउपनिवेश कहा जाने लगा) राष्‍ट्रीय मुक्ति संघर्ष की उत्ताल तरंगें उठने लगीं। गु़लाम देशों के बौद्धिक मानस में राष्‍ट्रीय जागरण की नयी चेतना पैदा करने और समाजवाद की अवधारणा को स्थापित करने में अक्टूबर क्रान्ति ने कितनी बड़ी भूमिका निभायी थी, इसका प्रमाण भारत में 1918 से लेकर 1940 तक की अवधि में…