ईश्वर का प्रश्न‍ लीलाधर जगूड़ी

ईश्‍वर तुम शब्‍द हो कि वाक्‍य हो? अर्द्धविराम हो या पूर्णविराम? संबोधन हो या प्रश्‍नचिह्न? न्‍याय हो या न्‍यायशास्‍त्री? जन्‍म हो कि मृत्‍यु या तुम बीच की उलझन में निरा संभोग हो तुम धर्म हो कि कर्म हो या कि तुम सिर्फ एक कला हो रोग हो ईश्‍वर तुम फूलों जैसे हो या ओस जैसे चलने में तुम कैसे हो दो पैरोंवाले? चार पैरोंवाले या सिक्‍के जैसे? एक पुरानी कहानी में खड़े हो तुम तीन पैरों से अच्‍छे नहीं लगते चार हाथ और तीन पैर तुम चतुरानन हो या पंचानन (आखिर तुम्‍हारा कोई असली चेहरा तो होगा) हे ईश्‍वर तुम गर्मी हो या जाड़ा अँधेरा हो या उजाला? अन्‍न हो कि गोबर हो? ईश्‍वर तुम आश्‍चर्य हो कि विस्‍मय? भीतर के अँधेरे में आँख से पहुँचते हो या नाक से? कान से पहुँचते हो या उत्‍पीड़न से? आँख से पहुँचते हैं रंग नाक से गंध कान से पहुँचती हैं ध्‍वनियाँ त्‍वचा से पहुँचते हैं स्‍पर्श हे ईश्‍वर तुम इंद्रियों के आचरण में हो या मन के उच्‍चारण में? हे ईश्‍वर तुम सदियों से यहाँ क्‍यों नहीं हो जहाँ तुम्‍हारी सबसे ज्‍यादा और प्रत्‍यक्ष जरूरत है

वो पहली ईद

और आज ईद का मौका था। दिन याद करने का उसको; जिसके लिए कहा गया है "रब्बिल-आलमीन" और छोटा रहीम दौड़कर घर में घुसा तैयार हो रहे अब्बू की टांगो से लिपट कर बोला “अब्बू अजान हो रही है मैं भी चलूंगा”बाप की आंखें छलक आई मस्जिद में आज मेरे बच्चे की पहली नमाज होगी मेरे साथ या-अल्लाह, मॉं ने खुश होकर दोनों को जानमाज़ देकर रुखसत किया और आज मस्जिद तो जैसे चार गुनी हो गई थी लोगों ने एक साथ जब उसके सदके में सर झुकाया तो जैसे सातवें आसमान से आवाज आई कुबूल है-कुबूल है नमाज़ ख़त्म करके अपने रहीम अपने अब्बू के साथ खड़ा हुआ ही था की एक जोरदार धमाके ने पूरा मंजर बदल दिया मौत का काला धुँआ जब थोड़ा सा छटा तो वहाँ न रहीम था और ना उसके अब्बू था तो बस चीखों का पुकारों का महासागर नमाजियों का खून जमीन पर बहता हुआ नफरत की नई ईबारत लिख रहा था। झुलसी, अधजली लाशों के बू ने मस्जिद के लोबान को भी कमज़ोर कर दिया था। घरों से दौड़ कर आए रिश्तेदार अपने लोगों की लाशें ढूंढने में लगे थे। रहीम की रोती-बिलखती मॉं अपने लाडले को ढूंढ रही थी और अचानक उसे ठोकर लगी॥ नीचे देखा तो जमीन पर एक धड़ था खून से सना पैरों में नई चप्पल थी।जो अब्बू ने रहीम को ईद पर खरीद कर दी थी और तभी दूर कहीं पड़ोसी मुल्क की वादी में एक टूटे से घर का फोन बजा सामने से आवाज आई मुबारक हो भाई जान मिशन फतेह हुआ॥

जीवन संदेश

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना। रूप रस नव गन्ध दे, उपवन सदा सुरभित बनाना॥ (1) तोड़ता है कौन तुझको, गूँथता है कौन तुझको? फेंकता है, कुचता है, यह कभी परवाह मतकर- चाह ले मत झूमना तू, आह सहकर मुस्कराना। नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥ (2) भूलना उसको नहीं, जिसने तुझे ऐसा बनाया। फूलना मन में नहीं, परहित सदा जीवन लगाया॥ कीर्ति यश की कामना तू, भूलकर मन में न लाना। नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥ (3) यह उसी का विश्व सारा, है तुझे जिसने बनाया। कौन सा उपकार है, यदि तू उसी के काम आया॥ ध्यान रख कर्त्तव्य पथ, मन को कभी भी मत डिगाना। नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥ (4) फूल ते ऐ फूल! सारे विश्व को सुरभित बना दे। आज भूले विश्व को नव मार्ग का दर्शन करा दे॥ यह अमर संदेश अपने प्राण बन में गुनगुनाना। नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥ *समाप्त* ले.- पं. शिवशंकर लाल जी त्रिपाठी, हसवा (फतेहपुर)

हम दीवानों की क्या हस्ती

भगवती चरण वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में हुआ था। वर्माजी ने इलाहाबाद से बी॰ए॰, एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की और प्रारम्भ में कविता लेखन किया। फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात हुए। १९३३ के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे। १९३६ के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता में कार्य किया। कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का सम्पादन, फिर आकाशवाणी के कई केंन्दों में कार्य। बाद में, १९५७ से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्न साहित्यकार के रूप में लेखन। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित। पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त। आइए आनंद ले भगवती बाबु की एक सुप्रसिद्ध रचना का : हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए छक कर सुख-दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले हम स्वयं बंधे थे और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले -भगवतीचरण वर्मा

कविता कृष्ण पल्लवी की कविता -सच को जानना

जो लोहा गलाते हैं और धरती खोदकर खनिज निकालते हैं और अनाज उपजाते हैं, उनकी ज़ि‍न्‍दगी कब्रिस्‍तान जैसी होती है, आँखें पथरायी रहती हैं और सपनों को दीमक चाटते रहते हैं और सूझ-बूझ को लकवा मारे रहता है जबतक कि वे बँटे रहते हैं खण्‍ड-खण्‍ड में जाति, धर्म और इलाके के नाम पर और जबतक ऐसे मर्द खुद ही औरतों को दबाते रहते हैं। जैसे ही गिरती हैं ये दीवारें दुनिया की सारी सम्‍पदा के निर्माताओं को अहसास हो जाता है अपनी गुलामी का और अपनी अपरम्‍पार ताकत का। फिर वे उठ खड़े होते हैं और एक विशाल लोहे की झाड़ू थामे अपनी बलशाली भुजाओं में अनाचार-अत्‍याचार-लूट और गुलामी की सफाई करते हैं पूरी पृथ्‍वी से और उसे एक गठरी की तरह बाँधकर पीठ पर एक सुन्‍दर, मानवीय, शोषणमुक्‍त भविष्‍य की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। हालात बदले जा सकते हैं निश्‍चय ही यदि हम सच को जान लें और सारे भ्रमजालों को भी एक साथ मिलकर।

देश बदलता है- A Poem by Rishi Aacharya

देश बदलता है तो कुछ, सीनों में आग मचलती है चोर, उच्चको और लुटेरों की नींदे उड चलती है। जनता देख रही है सारे धूर्त और मक्कारों को भारत माँ को बेच चुके इस देश इन गद्दारों को ॥ भारत बंदी तो केवल छोटा सा एक बहाना है मंशा इनकी है की केवल अपना धन बचवाना है। काले धन के खड़े विरोधी काली नियत से साले ६० साल में भारत ने कितने साँप बग़ल में थे पाले ॥ काले धन की रोटी खाकर जिनके बच्चे पलते है कहना होगा उनमे से कुछ भारत बंद को चलते है। एक अकेला शेर खड़ा हो कर के जब चिल्लाता है फटा कलेजा फिर गीदड़ का खुद में मुँह में आता है।। आगे आने वाली पीढ़ी देगी जूतों के माला नेताजी और सेठाजी अब पड़ा तुम्हारा भी पाला। जाओ खाली करो तिज़ोरी , फेकों जितना संभाला एक तरफ खाई है दूजी और खुदा है अब नाला॥ दान धरम और पूण्य करम के दिन फिर वापस आये है गाँव के बूढ़े रामदीन ने, फिर से दिए जलाए है। दल के दल दल से उठकर सब गीत ख़ुशी के गाये है बंद नहीं अब सदा चलेगा भारत , मोदी आये है ॥ ऋषि आचार्य।      

रहस्यवाद -अज्ञेय की कविता

मैं भी एक प्रवाह में हूँ- लेकिन मेरा रहस्यवाद ईश्वर की ओर उन्मुख नहीं है मैं उस असीम शक्ति से संबंध जोड़ना चाहता हूँ अभिभूत होना चाहता हूँ- जो मेरे भीतर है। शक्ति असीम है- मैं शक्ति का एक अणु हूँ मैं भी असीम हूँ। एक असीम बूँद असीम समुद्र को अपने भीतर प्रतिबिंबित करती है, उस असीम अणु, उस असीम शक्ति को जो उसे प्रेरित करती है अपने भीतर समा लेना चाहता है। उसकी रहस्यमयता का परदा खोलकर उसमें मिल जाना चाहता है- यही मेरा रहस्यवाद है।

मानव अकेला– अज्ञेय की कविता

भीड़ों में जब-जब जिस-जिस से आँखें मिलती हैं वह सहसा दिख जाता है मानव अंगारे सा- भगवान्-सा अकेला। और हमारे सारे लोकाचार राख की युगों-युगों की परतें हैं।

घृणा का गान – अज्ञेय की कविता

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान! तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचा कर भागे, तुम, जो बहिनें छोड़ बिलखती, बढ़े जा रहे आगे! रुक कर उत्तर दो, मेरा है अप्रतिहत आह्वान- सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!   तुम, जो बड़े-बड़े गद्दों पर ऊँची दूकानों में, उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते हैं खानों में, तुम, जो रक्त चूस ठठरी को देते हो जल-दान- सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!   तुम, जो महलों में बैठे दे सकते हो आदेश, 'मरने दो बच्चे, ले आओ खींच पकड़ कर केश!' नहीं देख सकते निर्धन के घर दो मुट्ठी धान सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!   तुम, जो पा कर शक्ति कलम में हर लेने की प्राण- 'नि:शक्तों' की हत्या में कर सकते हो अभिमान! जिनका मत है, 'नीच मरें, दृढ़ रहे हमारा स्थान'- सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!   तुम, जो मंदिर में वेदी पर डाल रहे हो फूल, और इधर कहते जाते हो, 'जीवन क्या है? धूल!' तुम, जिस की लोलुपता ने ही धूल किया उद्यान- सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!   तुम, सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन, जीवन के चिर-रिपु, विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन, तुम, श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान- आज तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

हरा-भरा है देश – अज्ञेय की कविता

हरे-भरे हैं खेत मगर खलिहान नहीं : बहुत महतो का मान- मगर दो मुठ्ठी धान नहीं। भरा है दिल पर नीयत नहीं : हरी है कोख- तबीयत नहीं।   भरी हैं आँखें पेट नहीं : भरे हैं बनिये के काग़ज़- टेंट नहीं।   हरा-भरा है देश : रुँधा मिट्टी में ताप पोसता है विष-वट का मूल- फलेंगे जिस में शाप।   मरा क्या और मरे इसलिए अगर जिये तो क्या : जिसे पीने को पानी नहीं लहू का घूँट पिये तो क्या;   पकेगा फल, चखना होगा उन्हीं को जो जीते हैं आज : जिन्हें हैं बहुत शील का ज्ञान- नहीं हैं लाज।   तपी मिट्टी जो सोख न ले अरे, क्या है इतना पानी? कि व्यर्थ है उद्बोधन, आह्वान- व्यर्थ कवि की बानी?