एक स्त्री पर कीजिए विश्वास- कविताएँ कुमार अंबुज

जब ढह रही हों आस्थाएँ जब भटक रहे हों रास्ता तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव अपने अँधेरों में से निकालकर देगी वही एक कंदील   कितने निर्वासित, कितने शरणार्थी, कितने टूटे हुए दुखों से, कितने गर्वीले कितने पक्षी, कितने शिकारी सब करते रहे हैं एक स्त्री की गोद पर भरोसा जो पराजित हुए उन्हें एक स्त्री के स्पर्श ने ही बना दिया विजेता जो कहते हैं कि छले गए हम स्त्रियों से वे छले गए हैं अपनी ही कामनाओं से   अभी सब कुछ गुजर नहीं गया है यह जो अमृत है यह जो अथाह है यह जो अलभ्य दिखता है उसे पा सकने के लिए एक स्त्री की उपस्थिति उसकी हँसी, उसकी गंध और उसके उफान पर कीजिए विश्वास   वह सबसे नयी कोंपल है और वही धूल चट्टानों के बीच दबी हुई एक जीवाश्म की परछाईं।

ईरानी मजदूर सबीर हका की कविताएं

*ईरानी मजदूर सबीर हका की कविताएं* अनुवाद व कविताओं का परिचय- गीत चतुर्वेदी इस ब्लॉग से साभार - सबद (vatsanurag.blogspot.com) 1⃣ *शहतूत* क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है, जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है. गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं. मैंने कितने मज़दूरों को देखा है इमारतों से गिरते हुए, गिरकर शहतूत बन जाते हुए.   2⃣ *(ईश्‍वर)*(ईश्‍वर) भी एक मज़दूर है ज़रूर वह वेल्‍डरों का भी वेल्‍डर होगा. शाम की रोशनी में उसकी आंखें अंगारों जैसी लाल होती हैं, रात उसकी क़मीज़ पर छेद ही छेद होते हैं. 3⃣ *बंदूक़* अगर उन्‍होंने बंदूक़ का आविष्‍कार न किया होता तो कितने लोग, दूर से ही, मारे जाने से बच जाते. कई सारी चीज़ें आसान हो जातीं. उन्‍हें मज़दूरों की ताक़त का अहसास दिलाना भी कहीं ज़्यादा आसान होता. 4⃣ *मृत्‍यु का ख़ौफ़* ताउम्र मैंने इस बात पर भरोसा किया कि झूठ बोलना ग़लत होता है ग़लत होता है किसी को परेशान करना ताउम्र मैं इस बात को स्‍वीकार किया कि मौत भी जि़ंदगी का एक हिस्‍सा है इसके बाद भी मुझे मृत्‍यु से डर लगता है डर लगता है दूसरी दुनिया में भी मजदूर बने रहने से. 5⃣ *कॅरियर का चुनाव* मैं कभी साधारण बैंक कर्मचारी नहीं बन सकता था खाने-पीने के सामानों का सेल्‍समैन भी नहीं किसी पार्टी का मुखिया भी नहीं न तो टैक्‍सी ड्राइवर प्रचार में लगा मार्केटिंग वाला भी नहीं मैं बस इतना चाहता था कि शहर की सबसे ऊंची जगह पर खड़ा होकर नीचे ठसाठस इमारतों के बीच उस औरत का घर देखूं जिससे मैं प्‍यार करता हूं इसलिए मैं बांधकाम मज़दूर बन गया. 6⃣ *मेरे पिता* अगर अपने पिता के बारे में कुछ कहने की हिम्‍मत करूं तो मेरी बात का भरोसा करना, उनके जीवन ने उन्‍हें बहुत कम आनंद दिया वह शख़्स अपने परिवार के…

अनुभवी पिता की सीख – शिवराम

एक चुप्पी हजार बलाओं को टालती है चुप रहना सीख सच बोलने का ठेका तूने ही नहीं ले रखा है   दुनिया के फटे में टांग अडाने की क्या पडी है तुझे मीन मेख मत निकाल जैसे और निकाल रहे हैं तू भी अपना काम निकाल जैसा भी है यहां का तो यही दस्तूर है ये नैतिकता-फैतिकता का चक्कर छोड़ सब चरित्रवान भूखों मरते हैं कोई धन्धा पकड़ एक के दो, दो के चार बना सिद्वान्त और आदर्श नहीं चलते यहां ये व्यवहार की दुनिया है व्यावहारिकता सीख अपनी जेब में चार पैसे कैसे आएं इस पर नजर रख   ‘‘मतलब पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है’’ यह कहावत अब पुरानी पड़ गई है अब कोई गधा बाप बनना पसन्द नहीं करता आजन्म कुंवारा रहता है जिन्दगी को भोगता है बाप का तमगा लिए नहीं फिरता है इसलिए मतलब पड़ने पर अब गधे को बाप नहीं किसी सभा का अध्यक्ष बनाया जाता है और बताया जाता है कि ऐसे महापुरूष धरती पर कभी-कभी ही अवतरित होते हैं तू भी यह करना सीख   अक्ल का दुश्मन मत बन ये दीन-दुनिया, देश और समाज के गीत गाना छोड़ किसी बड़े आदमी की दुम पकड़ बड़ा आदमी बन तेरे भी दुम होगी दुमदार होगा तो दमदार भी होगा दुम होगी तो दुम उठाने वाले भी होंगे रुतबा होगा कार-कोठी-बंगले भी होंगे इसीलिए कहता हूं ऐरों-गैरों नत्थूखैरों को मुँह मत लगा   जो सुख चावे जीव कू तो भौंदू बन के रह हिम्मत और सूझबूझ से काम ले और भगवान पर भरोसा रख शिवराम

कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें

आओ मेरे बच्चों कि ये रात बहुत भारी है आओ मेरे बच्चों कि बेकार परदादारी है मैं हार गया हूं अब ये साफ़ कह देना चाहता हूं सीने से तुमको लिपटा कर सो जाना चाहता हूं मेरी बेबसी, बेचारगी, ये मेरे डर हैं कि हर हत्या का गुनाह मेरे सर है मेरी आंखों में अटके आंसुओं को अब बह जाने दो उफ़ तुम्हारी आंखों में बसे सपने, अब रह जाने दो आओ कि आख़िरी सुक़ून भरी नींद में डूब जाएं आओ कि इस ख़ूं-आलूदा जहां से बहुत दूर जाएं काश कि यह हमारी आख़िरी रात हो जाए काश कि यह हमारा आख़िरी साथ हो जाए कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमें कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें जहां कि नफ़रत ही जीने का तरीक़ा हो जहां कि मारना ही जीने का सलीका हो इंसानों के ख़ून से ही जहां क़ौमें सींची जाती हैं लाशों पर जहां राष्ट्र की बुनियादें रखी जाती हैं ये दुनिया को बाज़ार बनाने की कवायदें इंसानियत को बेज़ार बनाने की रवायतें ये हथियारों के ज़खीरे, ये वहशत के मंज़र ये हैवानियत से भरे, ये दहशत के मंज़र जिन्हें यही चाहिए, उन्हें अपने-अपने ख़ुदा मुबारक हों जिन्हें यही चाहिए. उन्हें ये रक्तरंजित गर्व मुबारक हों जिन्हें ऐसी ही चाहिए दुनिया वे शौक से बना लें अपने स्वर्ग, अपनी जन्नत वे ज़ौक़ से बना लें इस दुनिया को बदल देने के सपने, अब जाने दो मेरे बच्चों, मुझे सीने से लिपट कर सो जाने दो कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमे कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें ००००० रवि कुमार (https://ravikumarswarnkar.wordpress.com/ से साभार )