विश्व-मंदिर वियोगी हरि

परमेश्वर का यह समस्त विश्व ही महामंदिर है। इतना सारा यह पसारा उसी घट घट-व्यापी प्रभु का घर है, उसी लामकाँ का मकान है। पहले उस मनमोहन को अपने अंदर के मंदिर में दिल भर देख लो, फिर दुनिया के एक-एक जर्रे में उस प्यारे को खोजते चलो। सर्वत्र उसी प्रभु का सुंदर मंदिर मिलेगा, जहाँ-तहाँ उसी का सलोना घर दिखेगा। तब अविद्या की ‍अँधेरी रात बीत गई होगी। प्रेम के आलोक में तब हर कहीं भगवान के मंदिर-ही-मंदिर दिखाई देंगे। यह बहस ही न रहेगी कि उस राम का वास इस घर में है या उसमें। हमारी आँखों में लगन की सच्ची पीर होगी, तो उसका नूर हर सूरत में नजर आएगा, कोने-कोने से साँवले गोपाल की मोहिनी बाँसुरी सुनाई देगी। हाँ, ऐसा ही होगा, बस आँखों पर से मजहबी तअस्सुब का चश्मा उतारने भर की देर है। यों तो ऐसा सुंदर मंदिर कोई भी भावुक भक्त एक आनंदमयी प्रेमकल्पना के सहारे अपने हृदय-स्थल पर खड़ा कर सकता है या अपने प्रेमपूर्ण हृदय को ही विश्व-मंदिर का रूप दे सकता है। पर क्या ही अच्छा हो, यदि सर्वसाधारण के हितार्थ सचमुच ही एक ऐसा विशाल विश्व मंदिर खड़ा किया जाए। क्यों न कुछ सनकी सत्यप्रेमी नौजवान इस निर्माण-कार्य में जुट-जाएँ। इससे निस्संदेह संशय, अविश्वास और अनिश्वरता का दूषित वायुमंडल हट जाएगा और सूखे दिलों से भी फिर एक बार प्रेम-रस का स्रोत फूट पड़ेगा। यह विश्व-मंदिर होगा कैसा? एक अजीब-सा मकान होगा वह। देखते ही हर दर्शक की तबीयत हरी हो जाएगी। रुचि वैचित्र्य का पूरा ख्याल रखा जाएगा। भिन्नताओं में अभिन्नता दिखाने की चेष्टा की जाएगी। नक्शा कुछ ऐसा रहेगा, जो हर एक की आँखों में बस जाए। किसी एक खास धर्म-संप्रदाय का न होकर वह मंदिर सर्व धर्म संप्रदायों का समन्वय-मंदिर होगा। वह सबके लिए होगा, सबका होगा। वहाँ बैठकर सभी सबके मनोभावों की रक्षा कर सकेंगे,…

गेहूँ बनाम गुलाब रामवृक्ष बेनीपुरी

गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे ! गेहूँ - उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ ! मैदान जोते जा रहे हैं, बाग उजाड़े जा रहे हैं - गेहूँ के लिए। बेचारा गुलाब - भरी जवानी में सि‍सकियाँ ले रहा है। शरीर की आवश्‍यकता ने मानसिक वृत्तियों को कहीं कोने में डाल रक्‍खा है, दबा रक्‍खा है। किंतु, चाहे कच्‍चा चरे या पकाकर खाए - गेहूँ तक पशु और मानव में क्‍या अंतर? मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्‍यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी। यही नहीं, जब उसकी भूख खाँव-खाँव कर रही थी तब भी उसकी आँखें गुलाब पर टँगी थीं। उसका प्रथम संगीत निकला, जब उसकी कामिनियाँ गेहूँ को ऊखल और चक्‍की में पीस-कूट रही थीं। पशुओं को मारकर, खाकर ही वह तृप्‍त नहीं हुआ, उनकी खाल का बनाया ढोल और उनकी सींग की बनाई तुरही। मछली मारने के लिए जब वह अपनी नाव में पतवार का पंख लगाकर जल पर उड़ा जा रहा था, तब उसके छप-छप में उसने ताल पाया, तराने छोड़े ! बाँस से उसने लाठी ही नहीं बनाई, वंशी भी बनाई। रात का काला-घुप्‍प परदा दूर हुआ, तब यह उच्छवसित हुआ सिर्फ इसलिए नहीं कि अब पेट-पूजा की समिधा जुटाने में उसे सहूलियत मिलेगी, बल्कि वह आनंद-विभोर हुआ, उषा की लालिमा से, उगते सूरज की शनै: शनै: प्रस्‍फुटित होनेवाली सुनहली किरणों…

धर्म की आड़- गणेशशंकर विद्यार्थी

इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्‍पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और जिद की जाती है, तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ धर्म और ईमान को जानें, या न जानें, परंतु उसके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़ने वाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता-बुझता और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हैं उधर जुत जाता है। यथार्थ दोष है, कुछ चलते-पुरजे, पढ़े-लिखे लोगों का जो मूर्ख लोगों की शक्तियों और उत्‍साह का दुरुपयोग इसलिए कर रहे हैं कि इस प्रकार, जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्‍व और बड़प्‍पन कायम रहे। इसके लिए धर्म और ईमान की बुराइयों से काम लेना उन्‍हें सबसे सुगम मालूम पड़ता है। सुगम है भी। साधारण-से-साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्‍छी तरह बैठी हुई कि धर्म और ईमान की रक्षा के लिए प्राण तक दे देना वाजिब है। बेचारा साधारण आदमी धर्म के तत्‍वों को क्‍या जाने? लकीर पीटते रहना ही वह अपना धर्म समझता है। उसकी इस अवस्‍था से चालाक लोग इस समय बहुत बेजा फायदा उठा रहे हैं। पाश्‍चात्‍य देशों में, धनी लोग गरीब मजदूरों के परिश्रम बेजा लाभ उठाते हैं। उसी परिश्रम की बदौलत गरीब मजदूर की झोंपड़ी का मजाक उड़ाती हुई उनकी अट्टालिकाएँ आकाश से बातें करती है! गरीबों की कमाई ही से वे मोटे पड़ते हैं और उसी के बल से वे सदा इस बात का प्रयत्‍न करते हैं कि गरीब सदा चूसे जाते रहे। यह भयंकर अवस्‍था है! इसी के कारण, साम्‍यवाद, बोल्‍शेविज्म आदि का जन्‍म हुआ। हमारे देश में इस समय, धनपतियों का इतना जोर नहीं है। यहाँ, धर्म…

नवयुग का संदेश-गणेशशंकर विद्यार्थी

वर्तमान युग में बड़े बल और वेग के साथ संसार के सामने जनसत्‍ता की समस्‍या उपस्थित की है। एक समय था कि लाखों और करोड़ों आदमियों पर केवल एक आदमी की मनमानी हुकूमत चलती थी। सत्‍यता और शिष्‍टता के आचरण में बढ़े-चढ़े कहे जाने वाले धन और बल से संपन्‍न लाखों और करोड़ों आदमियों के भाग्‍य का निपटारा केवल एक व्‍यक्ति की इच्‍छा पर निर्भर था। वे उसकी मनमानी आज्ञाओं का सुनना और उसका चुपचाप बहुधा बड़ी श्रद्धा के साथ पालन करना अपने जीवन का परम धर्म समझते थे। उसकी मूर्खता से लोगों का सर्वनाश भले अपने जीवन का परम धर्म समझते थे। उसकी मूर्खता से लोगों का सर्वनाश भले ही हो जाता, तो भी उसकी ऊँगली के इशारे तक पर चलने से इंकार करने की इच्‍छा बहुत ही कम लोगों में पैदा होती। वह उनका मालिक था, वे उसके बंदे। वह उसका रक्षक था, वे उसकी भेड़ें। वे धन और माल के उत्‍पादक थे, वह उनका भोक्‍ता। वे अपने शरीरों के धारण करने वाले थे, वह उनसे काम लेने वाला। बात यहीं समाप्‍त नही होती। प्रभुता के इस देवता के चबूतरे जगह-जगह पर स्‍थापित थे। ऊँची जाति और छोटी जाति के बची बड़ी गहरी खाई थी। उस श्रेणी के आदमी के भी वैसे ही हाथ और वैसे ही पैर होते। उसके भी वैसी ही आँखें और वैसे ही कान होते। आवाज में भी कोई फर्क न होता और चितवन में भी कोई खास बात न होती। वह बीमार भी पड़ता और अंत में उसकी मृत्‍यु भी होती, परंतु निम्‍न श्रेणी के आदमी की मजाल न थी कि कुलीनता की अवहेलना की इच्‍छा तक करता। लोगों के दिलों में कुलीनता की धाक ऐसी गहरी बैठी हुई थी कि कुलीन उन्‍हें अपना सेवक समझना अपना धर्म मानते और वे इसी में अपने को धन्‍य समझते कि अपने-से ही नहीं, बहुत-सी हालतों…