सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी – सफेद गुड़

दुकान पर सफेद गुड़ रखा था. दुर्लभ था. उसे देखकर बार-बार उसके मुंह से पानी आ जाता था. आते-जाते वह ललचाई नजरों से गुड़ की ओर देखता, फिर मन मसोसकर रह जाता. आखिरकार उसने हिम्मत की और घर जाकर मां से कहा. मां बैठी फटे कपड़े सिल रही थी. उसने आंख उठाकर कुछ देर दीन दृष्टि से उसकी ओर देखा, फिर ऊपर आसमान की ओर देखने लगी और बड़ी देर तक देखती रही. बोली कुछ नहीं. वह चुपचाप मां के पास से चला गया. जब मां के पास पैसे नहीं होते तो वह इसी तरह देखती थी. वह यह जानता था. वह बहुत देर गुमसुम बैठा रहा, उसे अपने वे साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे. ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती. एकाध बार उसके मन में मां के बटुए से पैसे चुराने का भी ख्याल आया. यह ख्याल आते ही वह अपने को धिक्कारने लगा और इस बुरे ख्याल के लिए ईश्वर से क्षमा मांगने लगा. उसकी उम्र ग्यारह साल की थी. घर में मां के सिवा कोई नहीं था. हालाँकि मां कहती थी कि वे अकेले नहीं हैं, उनके साथ ईश्वर है. वह चूँकि मां का कहना मानता था इसलिए उसकी यह बात भी मान लेता था. लेकिन ईश्वर के होने का उसे पता नहीं चलता था. मां उसे तरह-तरह से ईश्वर के होने का यकीन दिलाती. जब वह बीमार होती, तकलीफ में कराहती तो ईश्वर का नाम लेती और जब अच्छी हो जाती तो ईश्वर को धन्यवाद देती. दोनों घंटों आंख बंद कर बैठते. बिना पूजा किए हुए वे खाना नहीं खाते. वह रोज सुबह-शाम अपनी छोटी-सी घंटी लेकर, पालथी मारकर संध्या करता. उसे संध्या के सारे मंत्र याद थे, उस समय से ही जब उसकी जबान तोतली थी. अब तो यह…

मक्सिम गोर्की की कहानी – वह लड़का

यह छोटी-सी कहानी सुनाना काफी कठिन होगा-इतनी सीधी-सादी है यह! जब मैं अभी छोटा ही था, तो गरमियों और वसन्त के दिनों में रविवार को, अपनी गली के बच्चों को इकट्ठा कर लेता था और उन्हें खेतों के पार, जंगल में ले जाता था। इन पंछियों की तरह चहकते, छोटे बच्चों के साथ दोस्तों की तरह रहना मुझे अच्छा लगता था। बच्चों को भी नगर की धूल और भीड़ भरी गलियों से दूर जाना अच्छा लगता था। उनकी माँएँ उन्हें रोटियाँ दे देतीं, मैं कुछ मीठी गोलियाँ खरीद लेता, क्वास की एक बोतल भर लेता और फिर किसी गड़रिये की तरह भेड़ों के बेपरवाह मेमनों के पीछे-पीछे चलता जाता-शहर के बीच, खेतों के पार, हरे-भरे जंगल की ओर, जिसे वसन्त ने अपने सुन्दर वस्त्रों से सजा दिया होता। आमतौर पर हम सुबह-सुबह ही शहर से बाहर निकल आते, जब कि चर्च की घण्टियाँ बज रही होतीं और बच्चों के कोमल पाँवों के जमीन पर पड़ने से धूल उठ रही होती। दोपहर के वक्त, जब दिन की गरमी अपने शिखर पर होती, तो खेलते-खेलते थककर, मेरे मित्र जंगल के एक कोने में इकट्ठे हो जाते। तब खाना खा लेने के बाद छोटे बच्चे घास पर ही सो जाते-झाड़ियों की छाँव में-जबकि बड़े बच्चे मेरे चारों ओर घिर आते और मुझे कोई कहानी सुनाने के लिए कहते। मैं कहानी सुनाने लगता और उसी तेजी से बतियाता, जिससे मेरे दोस्त और जवानी के काल्पनिक आत्मविश्वास तथा जिन्दगी के मामूली ज्ञान के हास्यास्पद गर्व के बावजूद मैं अक्सर अपने आपको विद्वानों से घिरा हुआ किसी बीस वर्षीय बच्चे-सा महसूस करता। हमारे ऊपर अनन्त आकाश फैला है, सामने है जंगल की विविधता-एक जबरदस्त खामोशी में लिपटी हुई; हवा का कोई झोंका खड़खड़ाता हुआ पास से निकल जाता है, कोई फुसफुसाहट तेजी से गुजर जाती है, जंगल की सुवासित परछाइयाँ काँपती हैं और एक बार फिर…

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज की कहानी – ऐसे ही किसी दिन

अनुवाद – ‘मनोज पटेल’ आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से, वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले, जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे, और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था, और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी, जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है। औजारों को मेज पर व्यवस्थित करने के बाद वह ड्रिल को कुर्सी के पास खींच लाया और नकली दाँतों को चमकाने बैठ गया। वह अपने काम के बारे में सोचता नहीं दिख रहा था, बल्कि, ड्रिल को अपने पैरों से चलाते हुए, तब भी जबकि उसकी जरूरत नहीं होती थी, वह निरंतर काम किए जा रहा था। ‘पापा।’ ‘क्या है?’ ‘मेयर पूछ रहे हैं कि क्या आप उनका दाँत निकाल देंगे।’ ‘उससे बता दो कि मैं यहाँ नहीं हूँ।’ वह एक सोने का दाँत चमका रहा था। हाथ भर की दूरी पर ले जाकर उसने आँखें भींचकर दाँत को जाँचा-परखा। छोटे से वेटिंग रूम से फिर उसका…

Children story बाल निर्माण की कहानी घनश्याम की वीरता

‘तुम्हें रुपये देने हैं या नहीं’ क्रुद्ध आवाज में दीवान भीमराव भी चिल्ला रहे थे। ‘मैं जल्दी ही दे दूँगा। इस बार सूखा पड़ गया इसलिए नहीं दे पाया। आपने तो मेरी सदा ही सहायता की है। थोड़ी दया और कीजिए साहब।’ दोनों हाथ जोड़कर गरीब कृषक कह रहा था। ‘मैं कुछ नहीं जानता। बस मैं इतना ही कह रहा हूँ कि यदि तुमने एक सप्ताह के अन्दर पैसे नहीं दिये तो तुम्हारे घर की नीलामी करा दूँगा। तुम्हें रुपये इसलिये नहीं दिये थे कि उन्हें दबाकर बैठ जाओ। मूल देना तो दूर रहा, तुमने तो दो वर्ष में ब्याज तक नहीं दी है।’ दीवान जी चिल्लाकार बोले फिर वे क्रोध से पैर पटकते बैलगाड़ी में जाकर बैठ गये। उनके दोनों बेटे एक कोने में सहमें खड़े यह सब सुन रहे थे। पिता की दृष्टि उन पर गयी। तो बोले- ‘अरे तुम लोग क्या कर रहे हो यहाँ। स्कूल जाओ जल्दी से नहीं तो देर हो जायेगी।’ पिता का आदेश सुनकर घनश्याम और उसके भाई ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ चले। रास्ते भर घनश्याम के मन में वही दृश्य उभरता रहा। दीवान जी का क्रोध से तमतमाया चेहरा और रौबीली आवाज जैसे उसके सामने अभी भी साकार थे। पिता का करुण चेहरा भी उसकी आँखों के आगे आ रहा था। उसने सुना था कि दीवान बड़ा कठोर है। जो कहता है, वह करते उसे देर नहीं लगती। वह अनेक गरीब व्यक्तियों को ऋण देकर उन्हें ऐसे ही सताया करता था। कई बार तो घनश्याम ने लोगों को उसकी मौत की कामना करते हुए भी सुना था। यही बात सोचते-सोचते घनश्यामकृष्ण काले आगे बढ़ रहा था कि बाजार के बीच में उसे दीवान जी की बैलगाड़ी दिखाई दी। कुछ हल्ला-सा भी सुनाई दिया। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। घनश्याम भी एक ऊँची दुकान पर चढ़ गया और देखने…

दोपहर का भोजन Story by Amarkant Ji Dophar ka Bhojan

हमने हिन्‍दी कथाकार अमरकांत की कहानी 'डिप्‍टी कलेक्‍टरी' प्रस्‍तुत की थी। आज प्रस्‍तुत है उनकी दूसरी प्रसिद्ध कहानी 'दोपहर का भोजन'* सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी। अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई। आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई। लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं। वह उठी, बच्चे के मुँह पर अपना एक फटा, गंदा ब्लाउज डाल दिया और एक-आध मिनट सुन्न खड़ी रहने के बाद बाहर दरवाजे पर जा कर किवाड़ की आड़ से गली निहारने लगी। बारह बज चुके थे। धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर तौलिया या गमछा रखे हुए या मजबूती से छाता ताने हुए फुर्ती के साथ लपकते हुए-से गुजर जाते। दस-पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही, फिर उसके चेहरे पर व्यग्रता फैल गई और उसने आसमान तथा कड़ी धूप की ओर चिंता से देखा। एक-दो क्षण बाद उसने सिर को किवाड़ से काफी आगे बढ़ा कर गली के छोर की तरफ निहारा, तो उसका बड़ा लड़का रामचंद्र…

गौ- रक्षा

एक आदमी से उसके बेटे ने कहा पापा मेरे जन्मदिन पर क्या तोहफा लाओगे आज? आदमी सोच में पड़ गया , उसकी पत्नी बोली बच्चा बड़ा हो रहा है उसके लिए कुछ ढंग का गिफ़्ट ही लाना| आदमी चिढ़ते हुए बोला - अभी ज़रा जल्दी कर , गौ रक्षा की रैली में जा रहा हूँ , नेताजी ने जोरों से नारे लगवाने की ज़िम्मेदारी दी है , हर आदमी को २००० रु दे रहे है| शाम को लौटते समय उसी से कुछ ले आऊंगा| रैली ख़त्म हुई और उस आदमी ने अपने पैसे गिने | पूरे २००० थे | सीधे दुकानदार के पास जाकर बोला - ए भाई, देख लड़के का जन्मदिन है और तोहफ़े में कुछ ख़ास देना है| एक काम कर… जल्दी से प्योर काउ लेदर का पर्स, बेल्ट और जूते पैक कर दे| और हाँ....माल असली होना चाहिये|

ईश्वर की चिट्ठी

दुनियाँ की बगड़ती हालत को देखकर ईश्वर को एक दिन दया आ ही गयी| उसने सोचा - दुनियाँ वाले बेचारे मेरे संदेशो को शायद भूल गए है| उन्हें फिर से याद करवाना चाहिए| यह सोचकर उसने विश्व के चुनिंदा चर्चो, सिनगॉगो, मदिरों और मस्जिदों के धर्माधिकारियों को चिट्ठी लिखी| मेरे प्यारे धर्माध्यक्षों शायद आप मेरे दिए गए आदेशों को भूल गए हो इसलिए फिर से एक कॉपी भेज रहा हूँ , मूसा को मैंने यही आदेश हज़ारों सालों पहले सनाई पर्वत पर खुद लिख कर दिए थे , आशा है आप अपने पास आ रही जनता को इस बारे में ठीक ठीक समझा दोगे | यह दस आदेश इस प्रकार थे: १. तुम मेरे अलावा किसी अन्य भगवान को नहीं मानोगे २. तुम मेरी किसी तस्वीर या मूर्ती को नहीं पूजोगे ३. तुम अपने प्रभु भगवान का नाम अकारण नहीं लोगे ४. सैबथ का दिन याद रखना, उसे पवित्र रखना ५. अपने माता और पिता का आदर करो ६. तुम हत्या नहीं करोगे ७. तुम किसी से नाजायज़ शारीरिक सम्बन्ध नहीं रखोगे ८. तुम चोरी नहीं करोगे ९. तुम झूठी गवाही नहीं दोगे १०. तुम दूसरे की चीज़ें ईर्ष्या से नहीं देखोगे   टिपण्णी १ - हफ़्ते के सातवे दिन को सैबथ कहा जाता था जो यहूदी मान्यता में आधुनिक सप्ताह का शनिवार का दिन है। चिठ्ठी पाकर धरती पर खलबली मच गयी , मंदिरों, चर्चो और मस्जिदों में रातो-रात मीटिंग हुई| बहुत सोच विचार करने के बाद सब ने ईश्वर को एक कॉमन पत्र भेज दिया| पत्र कुछ यों था - ओ दुनियाँ के बनाने वाले हमारे प्रणाम स्वीकारे| प्रभु जो दस आज्ञाएँ आपने मूसा को दी थी वे हमें याद है लेकिन ज़माने के हिसाब से थोड़ा फेरफार करना पड़ा इसलिए हर आदेश के साथ हमारी टिप्पणी लिख कर भेज रहे है| १. तुम मेरे अलावा किसी अन्य…