कविता कृष्ण पल्लवी की कविता -सच को जानना

जो लोहा गलाते हैं और धरती खोदकर खनिज निकालते हैं और अनाज उपजाते हैं, उनकी ज़ि‍न्‍दगी कब्रिस्‍तान जैसी होती है, आँखें पथरायी रहती हैं और सपनों को दीमक चाटते रहते हैं और सूझ-बूझ को लकवा मारे रहता है जबतक कि वे बँटे रहते हैं खण्‍ड-खण्‍ड में जाति, धर्म और इलाके के नाम पर और जबतक ऐसे मर्द खुद ही औरतों को दबाते रहते हैं। जैसे ही गिरती हैं ये दीवारें दुनिया की सारी सम्‍पदा के निर्माताओं को अहसास हो जाता है अपनी गुलामी का और अपनी अपरम्‍पार ताकत का। फिर वे उठ खड़े होते हैं और एक विशाल लोहे की झाड़ू थामे अपनी बलशाली भुजाओं में अनाचार-अत्‍याचार-लूट और गुलामी की सफाई करते हैं पूरी पृथ्‍वी से और उसे एक गठरी की तरह बाँधकर पीठ पर एक सुन्‍दर, मानवीय, शोषणमुक्‍त भविष्‍य की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। हालात बदले जा सकते हैं निश्‍चय ही यदि हम सच को जान लें और सारे भ्रमजालों को भी एक साथ मिलकर।

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज की कहानी – ऐसे ही किसी दिन

अनुवाद – ‘मनोज पटेल’ आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से, वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले, जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे, और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था, और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी, जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है। औजारों को मेज पर व्यवस्थित करने के बाद वह ड्रिल को कुर्सी के पास खींच लाया और नकली दाँतों को चमकाने बैठ गया। वह अपने काम के बारे में सोचता नहीं दिख रहा था, बल्कि, ड्रिल को अपने पैरों से चलाते हुए, तब भी जबकि उसकी जरूरत नहीं होती थी, वह निरंतर काम किए जा रहा था। ‘पापा।’ ‘क्या है?’ ‘मेयर पूछ रहे हैं कि क्या आप उनका दाँत निकाल देंगे।’ ‘उससे बता दो कि मैं यहाँ नहीं हूँ।’ वह एक सोने का दाँत चमका रहा था। हाथ भर की दूरी पर ले जाकर उसने आँखें भींचकर दाँत को जाँचा-परखा। छोटे से वेटिंग रूम से फिर उसका…

भारत को आज़ादी क्या सिर्फ़ भारत की जनता के स्वतंत्रता आंदोलन और धरने प्रदर्शन से मिली? क्या आप भी यही मानते है?

निश्चित ही स्वतंत्रता या क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। स्वतंत्रता के लिए पांच वर्ष तक सतही तैयारी कर मजदूर,गुलाम,किसान,पादरी,वकील और सरकारी कर्मचारियों ने मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वर्ष तक एक हज़ार वर्गमील क्षेत्र में अंग्रेजों से सतत् संघर्ष करना पड़ा। फ़्रांस के लोग सात साल तक रक्त से सनी लड़ाई लड़े। भारत के लोगों ने न तो फ़्रांस और न ही अमेरिका की तरह युद्ध लड़ा।  जो गरमदल के क्रन्तिकारी नेता सुभाष, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह को समस्त जनता का साथ भी नहीं मिला।भारत की अधिकांश जनता ने सिर्फ़ आंदोलन, प्रदर्शन, और धरनों के सिवा और कोई रक्तपात से भरा जुझारूपन नहीं दिखाया जिससे अंग्रेज डर जाएँ। अंग्रेजों को भगाने की जो तैयारी की गई थी वो बिल्कुल अपर्याप्त थी, मुट्ठीभर क्रन्तिकारी इतनी बड़ी अंग्रेज सेना को नहीं भगा सकते थे। सभी क्रांतिकारी निमित्त मात्र थे। दूसरे महायुद्ध में ब्रिटेन जर्जर हो गया था, वो भारत में शासन करने के लिए अक्षम हो गया था और अपनी अक्षमताओं और वैश्विक दबाव में आकर मजबूरी में उसे भारत को स्वतन्त्र करना पड़ा। स्वयं विचार कीजिये *यदि ब्रिटेन मजबूर न होता तो सिर्फ़ धरने प्रदर्शन और असहयोग आंदोलन से देश कभी स्वतन्त्र भी न होता*। *महर्षि अरविन्द ने अपने पत्र 'वन्दे    मातरम्'* के अप्रैल 1908 के अंक में  लिखा था - *भारत की स्वतंत्रता ईश्वरीय योजना का एक भाग है तो फ़िर आप सोचेंगे क़ि वो पराधीन क्यों हुआ?* मुगल आतंकी राजाओ ने देश को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था, विकास के नाम पर कुछ नहीं किया बस लूटने में व्यस्त थे। हिन्दू राजाओं में एकता की शख़्त कमी थी जिसके कारण वो तबाह हुए। अंग्रेज़ो के भारत में रहने देने के पीछे एकमात्र कारण था भारत का विकास, जो एक दैवीय योजना का अंग था। उन्होंने ने आधुनिकता को भारत में लाया। काम खत्म होने के बाद…

रोग दूर भगाएँ-भाँति-भाँति के प्राणायाम. Pranayamas and their effects on health

प्राणायाम एक प्रकार से प्राण के आयाम में जाकर किया गया व्यायाम है। इससे समस्त अंग-अवयवों को शक्ति मिलती है। वे स्वस्थ-सबल बनते हैं। इसलिए योगशास्त्रों में स्वास्थ्य-संवर्द्धन के लिए प्राणायाम को एक अति उत्तम उपाय गया है। इसमें स्थूल से लेकर सूक्ष्मशरीर तक को प्रभावित करने की सामर्थ्य है, अतएव इसे आध्यात्मिक उपकारों में सर्वोपरि माना गया है। प्राणायाम के अनेकों प्रकार हैं। सभी की अपनी-अपनी क्षमता और विशिष्टता है। सभी की अपनी-अपनी क्षमता और विशिष्टता है। सभी में रोग निवारण के अद्वितीय गुण हैं। यदि व्यक्ति अपनी दिनचर्या में इसे सम्मिलित कर ले तो वह आजीवन स्वस्थ बना रह सकता है। आदमी यदि नीरोग नहीं रहेगा तो वह अपनी दैनिक क्रियाकलाप संपन्न कैसे कर सकेगा? ऐसी स्थिति में तो आत्मिक प्रगति उसके लिए दिवास्वप्न बन जाएगी, जबकि प्राणायाम का एक उद्देश्य आत्मोन्नति भी है। वह शरीर-स्वस्थता प्रदान करने के साथ-साथ व्यक्ति को आत्मोत्कर्ष की ओर भी ले चलता है। इसलिए प्राणायाम जीवन का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। प्राणायाम के तीन अंग हैं-श्वास लेना, रोकना और छोड़ना। इन तीनों क्रियाओं का योग ही पूर्ण प्राणायाम है। सभी प्राणायाम न्यूनाधिक अंतर के साथ इन्हीं का संयोग हैं। प्राणायाम के अभ्यास से सर्वप्रथम फेफड़ों को लाभ पहुँचता है। वे लचीले और मजबूत बनते हैं। शरीर में गरमी उत्पन्न होती है, जो स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव डालती है। बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। जितना अधिक ऑक्सीजन शरीर में बाहर निकलेगा। शारीरिक व्यायाम से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होता हैं और तत्वों का विभाजन होता है, फलस्वरूप शक्ति का ह्रास होता है। इस ह्रास की पूर्ति प्राणायाम द्वारा काया में अधिक ऑक्सीजन पहुँचाकर की जाती है। मस्तिष्क एवं नाड़ी संस्थान को भी यह प्रभावित करता है। मस्तिष्क के कार्यों को सुव्यवस्थित करने में इसका महत्वपूर्ण हाथ है। यह संपूर्ण मस्तिष्क के प्रसुप्त केंद्रों को जाग्रत करता और उन्हें शक्ति प्रदान…

Children story बाल निर्माण की कहानी घनश्याम की वीरता

‘तुम्हें रुपये देने हैं या नहीं’ क्रुद्ध आवाज में दीवान भीमराव भी चिल्ला रहे थे। ‘मैं जल्दी ही दे दूँगा। इस बार सूखा पड़ गया इसलिए नहीं दे पाया। आपने तो मेरी सदा ही सहायता की है। थोड़ी दया और कीजिए साहब।’ दोनों हाथ जोड़कर गरीब कृषक कह रहा था। ‘मैं कुछ नहीं जानता। बस मैं इतना ही कह रहा हूँ कि यदि तुमने एक सप्ताह के अन्दर पैसे नहीं दिये तो तुम्हारे घर की नीलामी करा दूँगा। तुम्हें रुपये इसलिये नहीं दिये थे कि उन्हें दबाकर बैठ जाओ। मूल देना तो दूर रहा, तुमने तो दो वर्ष में ब्याज तक नहीं दी है।’ दीवान जी चिल्लाकार बोले फिर वे क्रोध से पैर पटकते बैलगाड़ी में जाकर बैठ गये। उनके दोनों बेटे एक कोने में सहमें खड़े यह सब सुन रहे थे। पिता की दृष्टि उन पर गयी। तो बोले- ‘अरे तुम लोग क्या कर रहे हो यहाँ। स्कूल जाओ जल्दी से नहीं तो देर हो जायेगी।’ पिता का आदेश सुनकर घनश्याम और उसके भाई ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ चले। रास्ते भर घनश्याम के मन में वही दृश्य उभरता रहा। दीवान जी का क्रोध से तमतमाया चेहरा और रौबीली आवाज जैसे उसके सामने अभी भी साकार थे। पिता का करुण चेहरा भी उसकी आँखों के आगे आ रहा था। उसने सुना था कि दीवान बड़ा कठोर है। जो कहता है, वह करते उसे देर नहीं लगती। वह अनेक गरीब व्यक्तियों को ऋण देकर उन्हें ऐसे ही सताया करता था। कई बार तो घनश्याम ने लोगों को उसकी मौत की कामना करते हुए भी सुना था। यही बात सोचते-सोचते घनश्यामकृष्ण काले आगे बढ़ रहा था कि बाजार के बीच में उसे दीवान जी की बैलगाड़ी दिखाई दी। कुछ हल्ला-सा भी सुनाई दिया। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। घनश्याम भी एक ऊँची दुकान पर चढ़ गया और देखने…

बच्चों की भागीदारी और प्राथमिकताओं के चयन में मीडिया की भूमिका

*एकलसंस्कृतिकरण की प्रक्रिया के दौरान रोज़मर्रा के जीवन में बच्चों की भागीदारी और प्राथमिकताओं के चयन में मीडिया की भूमिका* 🖌हाली ओज़गुनर व दुइगू चुकूर (तुर्की)* (यह लेख बच्चों पर मीडिया के प्रभाव के विश्लेषण पर केन्द्रित है। इसमें अभिव्यक्त विचार लेखकों के अपने विचार हैं। -सं.)**1. परिचय* पूँजीवाद सत्ता में आने का और तकनोलॉजी के द्रुत विकास के ज़रिये उपभोग को अधिकतम सम्भव बढ़ाने का प्रयास करता रहा है। इसने पूँजी और सूचनाओं के संचरण को वैश्विक पैमाने पर सम्भव बना दिया है। इस प्रक्रिया के दौरान उपभोग को सभ्यता की कसौटी के तौर पर पेश किया जाता है और समान मूल्यों और जीवन शैलियों को पूरी दुनिया के विभिन्न देशों तक स्थानान्तरित किया जाता है। परिणामतः, समान उत्पादों का उपभोग एकलसंस्कृतिकरण की प्रक्रिया की ओर ले जाता है जो कि समाजों की अधिसंरचनाओं और उपसंरचनाओं को नियंत्रित करता है और जीवन के सभी अंगों का पुनर्निर्माण करता है। *यह प्रक्रिया बचपन से ही शुरू हो जाती है जो कि वह दौर है जब व्यक्ति की सामाज़िक अस्मिता का मोटे तौर पर निर्माण होता है। बच्चों को पहला शिक्षण उनके परिवारों के द्वारा सांस्कृतिक ढाँचे में समायोजन द्वारा दिया जाता है। यद्यपि, आज के बच्चे टेलीविज़न, वीडियो व कम्प्यूटर गेम्स से अपने परिवारों की अपेक्षा ज्यादा सम्पर्क में रहते हैं और पूंजीवादी व्यवस्था इन उपकरणों के जरिये सीधे बच्चों से संपर्क साधती है।* विभिन्न संस्कृतियों से आने वाले बच्चे इन चित्रों और मनोरंजनों के उपकरणों से प्रभावित होते हैं और जल्दी ही इन पर निर्भर बन जाते हैं। परिणामतः, उनकी सामाज़िक दुनिया मीडिया (टेलीविज़न, कंप्यूटर गेम्स, आदि) के ज़रिये उन्हीं समान मूल्यों और जीवन शैली से निर्मित होने लगती है। लेकिन हालिया वर्षों में उत्तरआधुनिकतावाद ने स्थानीय संस्कृतियों और स्थानीय अस्मिताओं को बढ़ावा दिया है, और सांस्कृतिक वैविध्य पर चर्चाएँ शुरू हो गयी हैं। सांस्कृतिक वैविध्य पर ज़ोर बढ़ा…

दोपहर का भोजन Story by Amarkant Ji Dophar ka Bhojan

हमने हिन्‍दी कथाकार अमरकांत की कहानी 'डिप्‍टी कलेक्‍टरी' प्रस्‍तुत की थी। आज प्रस्‍तुत है उनकी दूसरी प्रसिद्ध कहानी 'दोपहर का भोजन'* सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी। अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई। आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई। लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं। वह उठी, बच्चे के मुँह पर अपना एक फटा, गंदा ब्लाउज डाल दिया और एक-आध मिनट सुन्न खड़ी रहने के बाद बाहर दरवाजे पर जा कर किवाड़ की आड़ से गली निहारने लगी। बारह बज चुके थे। धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर तौलिया या गमछा रखे हुए या मजबूती से छाता ताने हुए फुर्ती के साथ लपकते हुए-से गुजर जाते। दस-पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही, फिर उसके चेहरे पर व्यग्रता फैल गई और उसने आसमान तथा कड़ी धूप की ओर चिंता से देखा। एक-दो क्षण बाद उसने सिर को किवाड़ से काफी आगे बढ़ा कर गली के छोर की तरफ निहारा, तो उसका बड़ा लड़का रामचंद्र…

डॉ अम्बेडकर और भारत के बहुजन

डॉ भीमराव अम्बेडकर के बारे में लोग उन्हें सिर्फ सविधान निर्माता और दलितों की आजादी के मसीहा के रूप में जानते है। उनके द्वारा किये गए वो अविस्मरणीय कार्य जो दलितों के लिए नहीं अपितु सबके लिए थे:- 1. सरदार पटेल के तीव्र विरोध के बावजूद उन्होंने महिलाओ सहित सभी को वोट का सवैधानिक अधिकार दिलाया। 2. महिलाओ को पुरुषो के समान वेतन दिलवाने का श्रेय उन्ही को जाता है। 3. महिलाओ के लिए प्रसूति अवकाश की व्यवस्था की। 4. 12 घण्टे काम करने की अवधी को घटाकर 8 घण्टे किए, इसी कड़ी में हफ्ते में 1 दिन के जरूरी अवकाश की व्यवस्था की। 5. व्यापर यूनियन को सरकारी मान्यता दिलवाई ताकि वो कानूनन अपनी मांग उठा सके। 6. भारत में एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज की व्यवस्था की ताकि सरकार के किसी विभाग के बंद होने पर कर्मचारियों को नौकरियों से न निकाला जाए। 7. कामगार वर्ग के हितो की रक्षा के लिए बिमा स्कीम लागू की। 8. हर 5 साल में वित्त आयोग की व्यवस्था की। 9. 1925 में अपनी पी०एच०डी० की थीसिस “प्रोब्लम ऑफ़ रुप्पी- ईट्स प्रोब्लम एंड ईट्स सोल्युशन” को हिल्टन यंग कमीशन से साझा किया और भारत में रिज़र्व बैंक की स्थापना करवाई। 10. एक न्यूनतम वेतनमान की व्यवस्था की। 11. उद्योग और कृषि के उत्पादन को बढ़ाने के लिए सस्ती व प्रचुर मात्रा में बिजली की जरूरत की सिफारिश की और बिजली विभाग, निगम और ग्रीड की स्थापना सुनश्चित की। 12. भारतीय सांख्यिकीय एक्ट बनाया जो देश में महंगाई उन्मूलन, मजदूरी, आय, लोन, बेगारी आदि सम्बंधित योजनाओ के लिए महत्वपूर्ण आंकड़े मुहैया करवाता है। 13. मजदूरो के हितों की रक्षा के लिए मजदूर विकास कोष की स्थापना। 14. देश के विकास में तकनीक और कुशल कामगार की जरूरत को ध्यान में रखते हुए टेक्निकल ट्रेनिंग और स्किल्ड वर्कर के लिए स्कीम बनाई। 15. बिजली के साथ सिंचाई…

शिकागो के शहीद मज़दूर नेताओं की कहानी- १ मई – मजदूर दिवस पर विशेष

  १ मई - मजदूर दिवस पर विशेष अपने संघर्ष के दौरान मज़दूर वर्ग ने बहुत-से नायक पैदा किये हैं। अल्बर्ट पार्सन्स भी मज़दूरों के एक ऐसे ही नायक हैं। यह कहानी अल्बर्ट पार्सन्स और शिकागो के उन शहीद मज़दूर नेताओं की है, जिन्हें आम मेहनतकश जनता के हक़ों की आवाज़ उठाने और ‘आठ घण्टे के काम के दिन’ की माँग को लेकर मेहनतकशों की अगुवाई करने के कारण 11 नवम्बर, 1887 को शिकागो में फाँसी दे दी गयी। मई दिवस के शहीदों की यह कहानी हावर्ड फ़ास्ट के मशहूर उपन्यास ‘अमेरिकन’ का एक हिस्सा है। इसमें शिलिंग नाम का एक बढ़ई मज़दूर आन्दोलन से सहानुभूति रखने वाले जज पीटर आल्टगेल्ड को अल्बर्ट पार्सन्स की ज़िन्दगी और शिकागो में हुई घटनाओं और मज़दूर नेताओं की क़ुर्बानी के बारे में बता रहा है। शिलिंग लेबर पार्टी से जुड़ा एक ईमानदार मज़दूर कार्यकर्ता है, जो पार्सन्स को तब से जानता है जब वह समाजवादी नहीं बना था। हालाँकि वह पार्सन्स के विचारों से सहमति नहीं रखता था, लेकिन वह उसकी नेकदिली, ईमानदारी और मेहनतकश लोगों की सच्ची आज़ादी पाने के लक्ष्य के प्रति उसकी सच्ची भावना की पूरे दिल से इज़्ज़त करता था। पार्सन्स जानता था कि ये मुट्ठीभर थैलीशाह अपनी मर्ज़ी से मज़दूरों के ख़ून की एक-एक बूँद निचोड़कर अपने ऐशो-आराम के सामान जुटाना बन्द नहीं करेंगे। वह मज़दूरों को संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने की राह बताता था। उस वक़्त मज़दूरों से चौदह-चौदह, सोलह-सोलह घण्टे काम लिया जाता था। दुनियाभर में अलग-अलग जगहों पर दिन में आठ घण्टे काम कराये जाने की माँग को लेकर आन्दोलन हो रहे थे। ‘आठ घण्टे के काम के दिन’ को लेकर शिकागो शहर की मुख्य सड़क मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकाला। दूसरी तरफ़, मज़दूरों की बढ़ती ताक़त और उनके नेताओं के अडिग…

The Exorcism Of Emily Rose का सच

 विश्व की कुछ चुनिंदा हॉरर फिल्मों की लिस्ट में The Exorcist और The Exorcism Of Emily Rose का नाम शायद ही कोई भूल सके| जिसने भी इस फिल्म को देखा है उसे शैतान की ताक़त का वो मंज़र देखा होगा की अंधेरे कमरे से एक बार तो डर लगा ही होगा| लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि The Exorcism Of Emily Rose एक सत्य घटना पर आधारित फ़िल्म थी| और असलियत में एमिली रोस थी पश्चिमी जर्मनी की Anneliese Michel (अन्नेलिएस मिशेल). मिशले जर्मनी में अपने परिवार के साथ ही रहती थी लेकिन उसे एपिलेप्सी की बीमारी थी| मनोचिकित्सकों ने उसका इलाज शुरू किया था लेकिन वह इस बीमारी के चलते निराशा और अवसाद का बुरी तरह शिकार बन चुकी थी|  कुछ समय बाद उसे अजीब तरह की आवाज़े और कुत्ते के भौंकने की ध्वनियाँ सुनाई देने लगी| उसकी माँ धार्मिक विश्वासों वाली महिला थी इसलिए उसने चिकित्सकों से इसका हल जानने की बजाय स्थानीय पादरियों से इस समस्या का कारण पुछा|   बहुत से पादरियों ने मिशेल की बीमारी को ऊपरी हवा नहीं मानते हुए उसपर धर्मविधि से ईलाज को मना किया|  लेकिन अततः दो पादरियों अर्नेस्ट ऑल्ट (Ernst Alt) और अर्नाल्ड रेंज (Arnold Renz) ने मिशेल की माँ को Exorcism के लिए हाँ कर दी|  उन्होंने इसलिए लिए कैथोलिक चर्च के तत्कालिन प्रमुख Bishop Josef Stangl से इस क्रिया के लिए अनुमति भी प्राप्त कर ली| Exorcism शब्द की उत्पति ग्रीक भाषा के शब्द exorkismós से हुई है जिसका अर्थ होता है “धार्मिक मन्त्रों से शैतान को बाँधना); शैतानी ताकतों का इंसानों में घुस जाना और फिर धार्मिक मंत्रों और कर्मकांडों से उसको निकालने का रिवाज़ आमतौर पर दुनियाँ के हरेक धर्म में पाया जाता है| आज भी कई ओझे, सयाने, पीर-फ़क़ीर गाँव-गाँव इसके लिए बाक़ायदा प्रशिक्षित होते है| इतिहास ऐसे लोगों की कहानियों से भरा पड़ा…