फेंगशुई एक धोखा, भारत को बचाइए

दोस्तों यह किस्सा मेरे नए मकान लेने की खुशी में दी गई पार्टी का है। किसी बड़े शहर में खुद का मकान होना मानो एक सपने की तरह होता है। और अगर यह सपना आपकी जवानी में ही साकार हो जाए तो खुशी दुगुनी हो जाती है। मेरे परिवार ने भी इस खुशी को बांटने के लिए अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों को शाम को डिनर पर बुलाया था। हसी-मजाक और मस्ती के माहौल में रात कैसे हो गई पता ही नहीं चला।शिष्टाचारवश जाते समय मित्रों ने नए घर के लिए उपहार भेंट किए। अगली सुबह जब हमने उपहारों को खोलना शुरू किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था! एक दो उपहारों को छोड़कर बाकी सभी में लाफिंग बुद्धा, फेंगशुई पिरामिड, चाइनीज़ ड्रेगन, कछुआ, चाइनीस फेंगसुई सिक्के, तीन टांगों वाला मेंढक, और हाथ हिलाती हुई बिल्ली जैसी अटपटी वस्तुएं भी दी गई थी। जिज्ञासा वर्ष मैंने इन उपहारों के साथ आए कागजों को पढ़ना शुरू किया जिसमें इन फेंगशुई के मॉडलों का मुख्य काम और उसे रखने की दिशा के बारे में बताया गया था। जैसे लाफिंग बुद्धा का काम घर में धन, दौलत, अनाज और प्रसन्नता लाना था और उसे दरवाजे की ओर मुख करके रखना पड़ता था। कछुआ पानी में डूबा कर रखने से कर्ज से मुक्ति, सिक्के वाला तीन टांगों का मेंढक रखने से धन का प्रभाव, चाइनीस ड्रैगन को कमरे में रखने से रोगों से मुक्ति, विंडचाइम लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह, प्लास्टिक के पिरामिड लगाने से वास्तुदोषों से मुक्ति, चाइनीज सिक्के बटुए में रखने से सौभाग्य में वृद्धि होगी ऐसा लिखा था।   यह सब पढ़ कर मैं हैरान हो गया क्योंकि यह उपहार मेरे उन दोस्तों ने दिए थे जो पेशे से इंजीनियर डॉक्टर और वकील जैसे पदों पर काम कर रहे थे। हद तो तब हो गई मेरे एक डॉक्टर मित्र ने…

सामाजिक चेतना के अग्रदूत – संत रैदास

संत कुलभूषण कवि रविदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। प्राचीनकाल से ही भारत में विभिन्न धर्मों तथा मतों के अनुयायी निवास करते रहे हैं। इन सबमें मेल-जोल और भाईचारा बढ़ाने के लिए सन्तों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे सन्तों में रैदास का नाम अग्रगण्य है। वे सन्त कबीर के गुरूभाई थे क्योंकि उनके भी गुरु स्वामीरामानन्द थे। जीवन   गुरू रविदास जी का जन्म काशी में चर्मकार (चमार) कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम संतो़ख दास (रग्घु) और माता का नाम कलसा देवी बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रविदास जी पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते…

श्रीकृष्ण के भाई बलराम ही थे ‘सुरसेवी’ – वेबदुनियाँ का चौंकाने वाला लेख

बलराम का नाम प्रत्येक हिन्दू जानता है- उन्हें हिन्दू धर्म में 'शेषनाग' का अवतार कहा जाता है| वे कृष्ण के बड़े भाई थे और कृष्ण की ही भाँति वे भी गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त कर आये थे| दोनों भाइयों का यज्ञोपवीत संस्कार भी साथ साथ ही हुआ लेकिन फिर भी - बलराम का चरित्र उतना धवल नहीं रहा जितना कृष्ण का| वेबदुनियाँ डॉट कॉम के एक लेख में महाभारत के वर्णन के आधार पर कुछ चौंकाने वाली जानकारियाँ दी है - प्रस्तुत है उसका एक अंश - बलराम का नाम ‘हलधर’ भी था, वे हल लिए रहते थे, और मदिरा का सेवन भी करते थे, इसीलिए शायद मदिरा का नाम भी ‘हलि प्रिया’ (किसानों का प्रिय) ही प्रचलित हो गया था। परन्तु उनकी प्रिय सुरा को आगे चलकर बलराम ने छोड़ भी दिया था, बलराम के विषय में कथा है कि उनकी पत्नी रेवती अति सुन्दर थी, वह मदिरा की प्याली अपने हाथों से भरकर बलराम को देती थी, उस समय उस प्याली में उनकी आंखों का प्रतिबिम्ब पड़ता था, कालिदास ने इसी का संकेत दिया है-‘हत्वा हालामथिमत रसां रेवती लोचनाङ्काम्’ महाभारत के समर के समय बलराम घर छोड़कर तीर्थ यात्रा को चल दिए थे, मदिरा छोड़ देने का कारण बतलाते हुए भी एक कथा कही गई है, जब बलराम तीर्थ यात्रा करते हुए नैमिषारण्य पहुंचे तब सब ऋषि उठकर स्वागत के लिए खड़े हो गए परन्तु सूत नहीं उठे, इसपर बलराम को बहुत क्रोध आ गया, बलराम ने सूत का मस्तक काट डाला। उस पाप निवारण के लिए सारे भारत में बलराम ने यात्रा की, उस समय मदिरा को छोड़ दिया था। जो भी हो महाभारत में कृष्ण को जितना महत्व मिला,  समर विमुख-होने के कारण बड़े भाई बलराम उपेक्षित ही रहे। आगे चलकर कृष्ण सर्वांश पूर्ण ‘कृष्णस्तु भगवान स्वयम्’ समझे माने गए। बलराम भगवान के भाई होते हुए भी सुरासेवी और…

Do not believe simply- Buddha The Gautama

“तुम किसी बात को केवल इसलिये मत स्वीकार करो कि यह अनुश्रुत है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि यह हमारे धर्मग्रंथ के अनूकूल है या यह तर्क सम्मत है , केवल इसलिये मत स्वीकरो कि यह यह अनुमान सम्मत है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि इसके कारणॊं की सावधानी पूर्वक परीक्षा कर ली गई है , केवल इसलिये मत स्वीकरो कि इस पर हमने विचार कर अनुमोदन कर लिया है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षक है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाला श्रमण हमारा पूज्य है । जब तुम स्वानुभव से यह जानो कि यह बातें अकुशल हैं और इन बातों के चलने से अहित होता है , दुख होता है तब तुम उन बातों को छॊड दो !” Lord Buddha ( Angutra Nikaya , vol 1, 188-193 )Do not believe in anything (simply) because you have heard it. Do not believe in traditions because they have been handed down for many generations.   Do not believe in anything because it is spoken and rumoured by many.   Do not believe in anything (simply)because it is found in your religious books.   Do not believe in anything merelely on the authority of your teachers & elders.   But after observations & analysis, when you find anything that agrees with reason and is conducive to the good & benefit of one & all then accept it & live upto it .   Buddha ( Angutra Nikaya , vol 1, 188-193 )

मैं नित्य जिन्दा प्रेतों को दफनाता हूँ

खलील जिब्रान अपनी कथा प्रधान शिक्षाओं के लिये एक ख्याति प्राप्त विद्वान थे। जीवन दर्शन संबंधी सूत्र जो उन्होंने अपनी सारगर्भित प्रतीकात्मक कहानियों में दिये, समय-समय पर मानव का मार्गदर्शन करते रहे हैं। मनोविज्ञान की गहराई में जाकर कैसे एक साधारण से उदाहरण से नैतिक सीख दी जा सकती है; इसकी झाँकी उनकी इस कथा से मिलती है। एक बार मैं सपना देख रहा था। स्वप्न में ही एक भयानक भूत आया और सामने खड़े होकर मुझे डराने लगा। पूछने लगा - तेरा नाम क्या है? मैंने डरते-डरते कहा-अबदुल्ला! उसने फिर तिरछी नजर से देखा और व्यंग्य की हँसी-हँसते हुए बोला-“इसका अर्थ तो ईश्वर का दास होता है। क्या तुम ईश्वर के दास हो, उसके भक्त हो? तुम्हारे कार्यों एवं चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता।” मैं अधिक सकपकाने लगा और उसकी भाव-भंगिमा से भयभीत हो भगाने की कोशिश करने लगा। भूत ने मुझे जाने नहीं दिया। कस कर पकड़ लिया और कहा तुम्हारी ही बिरादरी के लोग हैं जिनने मिलकर ईश्वर की नाकों दम कर रखी है। तुम्हीं लोगों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिये ईश्वर ने मुझे नियुक्त किया है। आज तो मैं तुम्हीं से निपटूँगा। भूत ने कहा-‘तुम लोग धर्म की बातें करके अपनी चमड़ी बचाते हो और उन कामों को करने में लगे रहते हो जिनकी खुदाने मना ही की है। धर्म के प्रवक्ताओं की इस क्रिया पद्धति से खुदा बहुत दुःखी एवं नाखुश हैं दुहरी गलती करने वालों पर खुदा दूने नाराज हैं। मैं क्या कहता। जान बचाकर किसी तरह घर जाने की पड़ी थी। विदाई का नमस्कार करते हुए पूछा-मेरी स्थिति को देखते हुए कुछ सेवा हो तो बताएँ और मुझे जाने दें। आगे से ऐसी गलती स्वयं नहीं करूंगा औरों की कह नहीं सकता। भूत की हँसी फूट पड़ी और मुस्कुराकर उसने मेरे हाथ में एक फावड़ा थमा दिया। कहा-फुरसत के समय तुम…

हस्तरेखा विज्ञान नहीं बड़ा धोखा – जानिए असली राज़

बेटा तुम्हारे हाथों की रेखाएं बता रही है की तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, रोज़गार में बरकत नहीं और परिवार में भी सुख नहीं है| शहरों में ५ सितारा दुकानों से लेकर नुक्कड़ के फुटपाथ तक हाथ देखने वालो की कमी नहीं है| करोड़ो रूपये का कारोबार हाथो की रेखाओं के दम पर किया जाता है और हिंदुस्तान में यह बीमारी कई सौ सालों से अपनी दुकान जमाये है|   आइये विज्ञान की नज़र से जानते है की हाथों में बनी ये लकीरे क्यों बनती है और इनकी मानव शरीर में क्या उपयोगिता है - हस्त रेखाओं को विज्ञान की भाषा में Palmar flexion creases कहा जाता है और इनका निर्माण गर्भ में ही भ्रूण के १० वे सप्ताह में होने लगता है| मुख्य रूप से यह रेखाएँ अनुवांशिक रूप में भी आकार लेती है और जन्म से ही बच्चों के हाथो में देखी जा सकती है|   एक प्रयोग करे - अपनी हाथों की रेखाओं को अपने माता पिता या परिवार के अन्य सदस्यों की रेखाओ से मिलाने प्रयास करे| आप हैरान होंगे की कई बार ९५ % से भी ज्यादा समानता के साथ ये रेखाएँ और उनकी बनावट अन्य सदस्यों के हाथो की रेखाओं से मिलती है|   जिस तरह हमारा रंग रूप नैन नक्श परिवार पर जाते है उसी तरह हाथो की लकीरे भी| यह एक सामान्य शारीरिक घटना है|   हस्त रेखाओं का कार्य: सामान्य रूप से हाथो में बनी ये लकीरे हाथों की पूरी तरह खोलते या बंद करते समय त्वचा को लचक देने का काम करती है , टाइपिंग जैसे कार्यों जहाँ हाथ अंदर की और मुड़ते है वहाँ हथेली का मांस इन्ही रेखाओं से मुड़ता है और खोलते समय यही रेखाएँ चौड़ी होती है| किसी वस्तु को ठीक से पकड़ते समय भी इन रेखाओ का काम महत्वपूर्ण हो जाता है|   एक विशेष…

और तब ईश्वर का क्या हुआ? स्टीवन वाइनबर्ग

( यह आलेख ‘समय के साये में’ से साभार यहां प्रस्तुत किया जा रहा है - मोडेरेटर )   ( 1933 में पैदा हुए अमेरिका के विख्यात भौतिक विज्ञानी स्टीवन वाइनबर्ग, अपनी अकादमिक वैज्ञानिक गतिविधियों के अलावा, विज्ञान के लोकप्रिय और तार्किक प्रवक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में काफ़ी ठोस लेखन कार्य किया है। कई सम्मान और पुरस्कारों के अलावा उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है।   प्रस्तुत आलेख में वाइनबर्ग ईश्वर और धर्म पर जारी बहसों में एक वस्तुगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बखूबी उभारते हैं, और अपनी रोचक शैली में विज्ञान के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हैं। इस आलेख में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का जिक्र करते हुए, अवैज्ञानिक तर्कों और साथ ही छद्मवैज्ञानिकता को भी वस्तुगत रूप से परखने का कार्य किया है तथा कई चलताऊ वैज्ञानिक नज़रियों पर भी दृष्टिपात किया है। कुलमिलाकर यह महत्त्वपूर्ण आलेख, इस बहस में तार्किक दिलचस्पी रखने वाले व्यक्तियों के लिए एक जरूरी दस्तावेज़ है, जिससे गुजरना उनकी चेतना को नये आयाम प्रदान करने का स्पष्ट सामर्थ्य रखता है। ) ---------------------------------------------------------------------------   तुम जानते हो पोर्ट ने कहा और उसकी आवाज़ फिर रहस्यमय हो गई, जैसा प्रायः किसी शांत जगह पर लंबे अंतराल पर कही गई बातों से प्रतीत होता है।   यहां आकाश बिल्कुल अलग है। जब भी मैं उसे देखता हूं, मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे कोई ठोस वस्तु हो जो हम लोगों को पीछे की हर चीज़ से रक्षा कर रही हो। किट ने हल्के से कांपते हुए पूछा - पीछे की हर चीज़ से? हाँ लेकिन पीछे है क्या? उसकी आवाज़ एकदम धीमी थी। मेरा अनुमान है, कुछ भी नहीं। केवल अंधेरा। घनी रात। - पॉल बोल्स, द शेल्टरिंग स्काई स्वर्ग ईश्वर के गौरव की घोषणा करते हैं और यह आकाश उनके दस्तकारी की प्रस्तुति है। राजा डेविड…

बुद्ध का सिद्धांत – डा आंबेडकर की पुस्तक से

बुद्ध का नाम सामान्यतः अहिंसा के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है। अहिंसा को ही उनकी शिक्षाओं व उपदेशों का समस्त सार माना जाता है। उसे ही उनका प्रारंभ व अंत समझा जाता है। बहुत कम व्यक्ति इस बात को जानते हैं कि बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे बहुत ही व्यापक है, अहिंसा से बहुत बढ़कर हैं। अतएव यह आवश्यक है कि उनके सिद्धांतों को विस्तापूर्वक प्रस्तुत किया जाए। मैंने त्रिपिटक का अध्ययन किया। उस अध्ययन से मैंने जो समझा, मैं आगे उसका उल्लेख कर रहा हूँ - 1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।   2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।   3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।   4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।   5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।   6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।   7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।   8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।   9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।   10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं।   11. कि संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।   12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और…

कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें

आओ मेरे बच्चों कि ये रात बहुत भारी है आओ मेरे बच्चों कि बेकार परदादारी है मैं हार गया हूं अब ये साफ़ कह देना चाहता हूं सीने से तुमको लिपटा कर सो जाना चाहता हूं मेरी बेबसी, बेचारगी, ये मेरे डर हैं कि हर हत्या का गुनाह मेरे सर है मेरी आंखों में अटके आंसुओं को अब बह जाने दो उफ़ तुम्हारी आंखों में बसे सपने, अब रह जाने दो आओ कि आख़िरी सुक़ून भरी नींद में डूब जाएं आओ कि इस ख़ूं-आलूदा जहां से बहुत दूर जाएं काश कि यह हमारी आख़िरी रात हो जाए काश कि यह हमारा आख़िरी साथ हो जाए कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमें कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें जहां कि नफ़रत ही जीने का तरीक़ा हो जहां कि मारना ही जीने का सलीका हो इंसानों के ख़ून से ही जहां क़ौमें सींची जाती हैं लाशों पर जहां राष्ट्र की बुनियादें रखी जाती हैं ये दुनिया को बाज़ार बनाने की कवायदें इंसानियत को बेज़ार बनाने की रवायतें ये हथियारों के ज़खीरे, ये वहशत के मंज़र ये हैवानियत से भरे, ये दहशत के मंज़र जिन्हें यही चाहिए, उन्हें अपने-अपने ख़ुदा मुबारक हों जिन्हें यही चाहिए. उन्हें ये रक्तरंजित गर्व मुबारक हों जिन्हें ऐसी ही चाहिए दुनिया वे शौक से बना लें अपने स्वर्ग, अपनी जन्नत वे ज़ौक़ से बना लें इस दुनिया को बदल देने के सपने, अब जाने दो मेरे बच्चों, मुझे सीने से लिपट कर सो जाने दो कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमे कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें ००००० रवि कुमार (https://ravikumarswarnkar.wordpress.com/ से साभार )

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